आज परचम सोसायटी लिटरेरी क्लब उर्दू आंगन सहारनपुर की ओर से राष्ट्रीय वूमन वेब निशिस्त कराई गई। जिसकी सदारत प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी हेड ऑफ उर्दू डिपार्टमेंट चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी मेरठ ने की। उर्दू के जाने-माने स्कॉलर और पत्रकार डॉक्टर शाहिद जुबैरी ने इफतिताही कलमात कहे कि जबान मां की आगोश में सीखी जाती है इसलिए जो महिलाएं किसी भी तरह से खिदमत अंजाम दे रही हैं मुबारकबाद की हकदार है । आज महिलाओं के इस ऑनलाइन निशिस्त की कनवीनर डॉक्टर कुदसिया अंजुम है जो किसी परिचय की मोहताज नहीं है । उन्होंने उर्दू की तरक्की के लिए कई सेमिनार भी कराये है । संचालन नुसरत परवीन ने किया ।
नशिस्त का आगाज करते हुए तलअत सरोहा सहारनपुर ने कुछ क्यों पढा़,
थी किस कदर शदीद ये मेहरो वफा की चोट
सर बच गया मगर लगी दिल पर बला की चोट
तलअत निगाहें नाज भी नाविक से कम नहीं
देखो ना तुम भी आके दिले मुबतला की चोट
शगुफ्ता मिज़ाज सहारनपुरी ने पढ़ा ,
मैं मोहब्बत हूं मोहब्बत से मोहब्बत करना
मेरी चाहत से ना ताउम्र बगावत करना
यूं ही शायद मेरी आंखों को करार आ जाए
चाहती हूं तेरे चेहरे की तिलावत करना
डॉक्टर कुदसिया अंजुम सहारनपुरी ने यू पढ़ा
चाके जिगर का सिलना बाकी है अभी तुम्हें कुछ कहना बाकी है लिखे थे जिसमें तुमने कुछ एहसास
यार अभी वह एक खत पुराना बाकी है
तरन्नुम सबा जसपुर उत्तराखंड ने कुछ यूँ पढ़ा,
अगरचे रात को रोशन तू कर ना पाएगा
मगर यह जुगनू अंधेरे में जगमगाएगा
यह कैसा बीज तकल्लुफ का तूने बोया है
शजर बनेगा तो बस फासले उगाएगा
असमा मकबूल लखनऊ ने कलाम पेश किया,
जो अपनी खुशियां जमाने को बांट देते हैं
इन्हीं के दिल से ही एहसासे गम निकलता है
अफरोज अजीज नई दिल्ली ने पढ़ा,
हर बार घर की लाज बचाने में रह गई
मैं रस्मे दुनियवी को निभाने में रह गई थी
जो साथ चले थे वो मंजिल को पा गए
मैं रास्तों से खार हटाने में रह गई
चश्मा फारूकी नई दिल्ली ने अपना कलाम कुछ यू पेश किया ,
एहसास देखिए मेरे अशआर देखिए
क्या कह रही है आपसे फनकार देखिए
अहले सितम के जबरो तशददुद के बावजूद
हक बोलता है फिर भी सरदार देखिए
सैयदा तबस्सुम नादकर मुंबई ने अपना कलाम सुनाया,
तू वो साकी है जमाने का निराला साकी
तेरे हाथों से मेरे वास्ते एक जाम बहुत
निगार नाज कोलकाता ने अपना कलाम पेश करते हुए पढ़ा,
ये तिश्नगी मेरे होठों पर एक पहेली है
तेरा ख्याल भी मुझ को सराब देने लगा
बिछड़ के जब भी मिला नाज़ मुद्दतों में कोई
तो हमको घर का तसव्वुर अज़ाब देने लगा
संचालन करते हुए नुसरत परवीन ने सभी शायरात का परिचय कराया और कुछ यूं पढ़ा
परों को काट भी दोगे,कफस में कैद कर लोगे
दिलों से ख्वाहिशें परवाज तुम कैसे मिटाओगे
सितम पे हो सितम चाहे मगर ये भी ज़रा सोचो
दीवानों का दीवानापन भला कैसे मिटाओगे
नशिस्त की कन्वीनर डॉ कुदसिया अन्जुम ने कहा कि हमारी कोशिश होगी कि उर्दू अदब के प्लेटफार्म से उभरती हुई शायरात को भी मौका मिले । सीनियर भी उन्हें मोरल सपोर्ट दें और उर्दू की तरक्की के लिए काम करें। अंत में सदर प्रोफेसर असलम जमशेदपुर ने परचम संस्था की प्रशंसा करते हुए कहा कि महिलाओं की सामाजिक संस्था परचम ने अवामी खिदमात में हमेशा सहारनपुर का परचम बुलंद किया है। इस तरह की निशिस्त से जहां उर्दू भाषा के फ फरोग में सहयोग देती है वही करोना जैसे माहमारी से तन्हाई के शिकार इंसान के लिए ऑक्सीजन से कम नहीं फिर एक दूसरे से परिचय और पहचान का जरिया भी है। निशिस्त में मौजूद तमाम शायरात को मुबारकबाद पेश की । आखिर मे प्रोग्राम कि कन्वीनर मोहतरमा डॉक्टर कुदसिया अंजुम को मुबारकबाद देते हुए शुक्रिया अदा किया।
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