बदलता ज़माना
ज़माना बदल गया बदल गए इंसान भी
आज बदला सब कुछ चाहत और प्यार भी
नहीं जहां में कुछ भी अब पहले जैसा
बदल गए है रिश्ते धरती और समाज भी
आज किसी की नज़र में कीमत नहीं है खून की
पैसा जिसकी जेब में वही सुल्तान और अमीर भी
भुला दिया है सबने वजूद और सम्मान को
मंज़िल बदली राहें बदली बदल गए मेहमान भी
चली गई रिश्तों से मिठास आ गई नफरत बीच में
खींच लाए है सब आज पैसे को बीच में
आज हुई खुशनुमा उदास कोई न आया सींचने
कल तक बांटी उसने खुशियां हर माहौल के बीच में
आज बदले सब उससे अपने और पराए भी
कल तक माना जिनको अपना
आंखो में बसाया बना कर सपना
उन्होंने उसको तन्हा छोड़ा समझा न किसी ने अपना
अब खुशनुमा खुद ही जिएगी
उम्मीदों के रंग भरेगी
फिर आएगी नई बहार
खिल उठेगा उसका संसार
फिर बदलेगा सब कुछ होंसले और उम्मीद भी
फिर होगी नई सुबह फिर बनेगी पहचान भी
बदल देगी वो सब कुछ
ये फिज़ा और बहार भी
खुशनुमा हयात (एडवोकेट/ कवयित्री
बुलंदशहर ,उत्तर प्रदेश।
प्रस्तुति,,,,ज़ीशान काज़मी
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